श्रद्धेय के. एस. सुदर्शन जी की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पाँचवें सरसंघचालक, महान राष्ट्रवादी विचारक और समाज-सेवी श्रद्धेय श्री के. एस. सुदर्शन जी की पुण्यतिथि पर कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ का विनम्र श्रद्धा-सुमन।
परिचय: एक युग-पुरुष की स्मृति में
भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी चेतना को नई ऊँचाइयाँ देने वाले श्रद्धेय श्री कुप्पाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन जी आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, उनकी साधना और राष्ट्र के प्रति उनका अटूट समर्पण हम सबके लिए एक अमर प्रकाश-स्तंभ बना हुआ है।
आज उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा —
"राष्ट्रवाद की इस धधकती ज्वाला को, इस महान विचारक को, संघ के पाँचवें सरसंघचालक श्रद्धेय श्री के. एस. सुदर्शन जी को उनकी पुण्यतिथि पर कोटि-कोटि नमन। उनका समर्पित जीवन, उनके विचार और राष्ट्र व समाज के प्रति सेवा-भाव हम सबको सदा प्रेरित करता रहेगा।"
जीवन परिचय: संघ की एक अडिग आत्मा
श्री के. एस. सुदर्शन जी का जन्म 18 जून 1931 को रायपुर, मध्य प्रांत (अब छत्तीसगढ़) में हुआ था। बचपन से ही राष्ट्र-भक्ति और सांस्कृतिक जागरण उनके जीवन का केंद्र-बिंदु था।
उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की, किंतु अपनी पूरी बौद्धिक और शारीरिक ऊर्जा उन्होंने राष्ट्र-सेवा को समर्पित कर दी। 1942 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और धीरे-धीरे संघ की विचारधारा के सबसे प्रखर और प्रभावशाली स्तंभों में से एक बन गए।
संघ में उनकी यात्रा:
- 1942: RSS से जुड़ाव
- सह-सरकार्यवाह के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका
- 2000–2009: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पाँचवें सरसंघचालक
- 11 सितंबर 2012: पार्थिव शरीर का महाप्रयाण
विचारधारा: स्वदेशी, स्वाभिमान और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
श्री सुदर्शन जी केवल एक संगठन-प्रमुख नहीं थे — वे एक दार्शनिक, चिंतक और दूरदर्शी राष्ट्रनायक थे। उनके विचारों के तीन मूल स्तंभ थे:
1. स्वदेशी का आग्रह
जब भारत वैश्वीकरण और उदारीकरण की आँधी में बह रहा था, तब सुदर्शन जी ने स्वदेशी जागरण मंच के माध्यम से यह संदेश दिया कि भारत की आर्थिक स्वतंत्रता उसकी सांस्कृतिक स्वतंत्रता की नींव है। उन्होंने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अंधानुकरण के विरुद्ध आवाज़ उठाई और भारतीय उद्यमिता, कृषि और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित किया।
2. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
सुदर्शन जी का मानना था कि भारत केवल एक भूगोल नहीं, एक जीवंत सभ्यता है। भारतीयता का अर्थ केवल नागरिकता नहीं — यह एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक बोध है। उन्होंने शिक्षा, परिवार, समाज और राज्य — सभी में भारतीय मूल्यों की पुनर्स्थापना की वकालत की।
3. शिक्षा में भारतीयकरण
उन्होंने मैकाले-प्रणाली की तीखी आलोचना करते हुए भारतीय भाषाओं, इतिहास और ज्ञान-परंपराओं पर आधारित वैकल्पिक शिक्षा-प्रणाली की माँग की। उनका स्पष्ट मत था कि जो शिक्षा बच्चे को उसकी जड़ों से काटे, वह वास्तव में शिक्षा नहीं — वह सांस्कृतिक पराधीनता है।
कर्नल राठौड़ की श्रद्धांजलि: एक सैनिक का नमन
कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ — ओलंपिक रजत पदक विजेता, भारतीय सेना के पूर्व अधिकारी, और राष्ट्रवादी राजनीति के एक सशक्त स्वर — स्वयं राष्ट्र-सेवा के उसी मार्ग पर चलते हैं जिसका प्रकाश श्रद्धेय सुदर्शन जी ने दिखाया था।
उनकी श्रद्धांजलि केवल शब्दों का समर्पण नहीं — यह एक विचारधारा की निरंतरता का संकल्प है। सुदर्शन जी ने जो बीज बोया — स्वदेशी का, स्वाभिमान का, सेवा का — वह आज लाखों स्वयंसेवकों, नेताओं और नागरिकों के जीवन में अंकुरित है।
उनकी विरासत: जो कभी समाप्त नहीं होती
श्री के. एस. सुदर्शन जी ने अपने पीछे कोई संपत्ति नहीं छोड़ी — उन्होंने छोड़ी एक विचार-संपदा, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी समृद्ध होती जाएगी।
उनकी विरासत जीवित है:
- लाखों स्वयंसेवकों की दैनिक शाखाओं में
- स्वदेशी जागरण मंच के आंदोलन में
- भारतीय शिक्षा, संस्कृति और परिवार की रक्षा के संकल्प में
- हर उस नागरिक में जो भारत माता की जय बोलते हुए गर्व अनुभव करता है
उपसंहार
श्रद्धेय के. एस. सुदर्शन जी की पुण्यतिथि पर हम सब यह संकल्प लें कि उनके दिखाए मार्ग पर चलते हुए — स्वदेशी अपनाएंगे, संस्कृति को सहेजेंगे, और राष्ट्र-सेवा में कभी पीछे नहीं हटेंगे।
कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ के शब्दों में — "उनका समर्पित जीवन हम सबको सदा प्रेरित करता रहेगा।"
🙏 श्रद्धेय के. एस. सुदर्शन जी को कोटि-कोटि नमन। 🙏

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