लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर जी को कोटि-कोटि नमन
कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ की श्रद्धांजलि
आज लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर जी की पुण्यतिथि पर हम सभी उनकी महान स्मृति को नमन करते हैं। इतिहास के पन्नों में जब भी किसी ऐसी महान विभूति का नाम आता है जिसने अपना संपूर्ण जीवन धर्म, जनसेवा और राष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण में समर्पित कर दिया — तो सबसे पहला नाम लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर का आता है।
कौन थीं लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर?
देवी अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के चौंडी गांव में हुआ था। वे मालवा साम्राज्य की महान शासक थीं जिन्होंने 1767 से 1795 तक शासन किया। उनका शासनकाल भारतीय इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है।
एक विधवा होने के बाद भी उन्होंने न केवल अपने राज्य की बागडोर संभाली, बल्कि संपूर्ण भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण में अतुलनीय योगदान दिया।
धर्म और संस्कृति की अद्वितीय संरक्षक
अहिल्याबाई होल्कर ने भारत के कोने-कोने में मंदिरों, घाटों, धर्मशालाओं और कुओं का निर्माण करवाया। उनके द्वारा निर्मित या जीर्णोद्धार किए गए प्रमुख स्थलों में शामिल हैं:
- काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी — जिसका पुनर्निर्माण उन्होंने अपने राजकोष से करवाया
- सोमनाथ मंदिर, गुजरात — जिसे उन्होंने पुनः स्थापित करने में सहयोग दिया
- केदारनाथ और बद्रीनाथ — जहां उन्होंने तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाओं का निर्माण करवाया
- महेश्वर — जिसे उन्होंने अपनी राजधानी बनाकर एक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित किया
- गया, मथुरा, द्वारका — जहां उन्होंने धार्मिक स्थलों का जीर्णोद्धार करवाया
यह केवल मंदिर निर्माण नहीं था — यह भारत की आत्मा को जीवित रखने का संकल्प था।
जनसेवा की जीवंत मिसाल
अहिल्याबाई केवल एक धर्मपरायण शासक नहीं थीं — वे एक कुशल प्रशासक और लोकसेवी राजमाता थीं। उनके शासनकाल में:
- किसानों को न्यायसंगत कर व्यवस्था का लाभ मिला
- व्यापारियों को सुरक्षित मार्ग और व्यापार की स्वतंत्रता प्राप्त हुई
- गरीबों और विधवाओं को राज्य की ओर से संरक्षण मिला
- सड़कों, कुओं और विश्राम स्थलों का व्यापक निर्माण हुआ
महेश्वर में उनके द्वारा स्थापित वस्त्र उद्योग आज भी जीवित है और महेश्वरी साड़ियां उनकी आर्थिक दूरदृष्टि का प्रमाण हैं।
कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का संदेश
कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ — जो स्वयं राष्ट्र के लिए समर्पित एक महान योद्धा, ओलंपिक पदक विजेता और सार्वजनिक जीवन में धर्म व सेवा के प्रतीक हैं — ने लोकमाता को श्रद्धांजलि देते हुए कहा:
"इस महान वीरांगना की पुण्यतिथि पर कोटि-कोटि नमन। धर्म, जनसेवा और जनकल्याण के प्रति आपकी निष्ठा तथा राष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण में आपका अतुलनीय योगदान सदा-सदा प्रेरणा देता रहेगा।"
यह श्रद्धांजलि केवल शब्द नहीं है — यह उस परंपरा का सम्मान है जिसने भारत को विश्वगुरु बनाया।
आज की पीढ़ी के लिए संदेश
लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर का जीवन हमें सिखाता है कि:
- सत्ता साधन है, साध्य नहीं — शासन जनसेवा के लिए होता है
- धर्म केवल पूजा नहीं — वह जीवन जीने की पद्धति है
- संस्कृति की रक्षा राष्ट्र की रक्षा है
- एक स्त्री की इच्छाशक्ति पर्वतों को भी झुका सकती है
आज उनकी पुण्यतिथि पर हम संकल्प लें कि उनके द्वारा दिखाए मार्ग पर चलते हुए हम भी अपने समाज और राष्ट्र की सेवा करेंगे।
जय लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर।
भारत माता की जय।

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