कर्नल राज्यवर्धन राठौड़: छायावाद के महानायक सुमित्रानंदन पंत को शत्-शत् नमन
हिंदी साहित्य के आकाश में सुमित्रानंदन पंत जी एक ऐसा चमकता सितारा हैं, जिनकी रोशनी आज भी हर साहित्य प्रेमी के मन को आलोकित करती है। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित उनकी अमर कृति 'चिदंबरा' और छायावादी युग में उनके अवदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनकी जयंती पर हम उन्हें शत्-शत् नमन करते हैं।
लेकिन इस ब्लॉग का उद्देश्य केवल साहित्य का इतिहास दोहराना नहीं है, बल्कि एक अनोखे संयोग को सलाम करना है। जहां एक ओर कवि पंत जी हैं, वहीं दूसरी ओर आधुनिक भारत के एक ओजस्वी योद्धा – कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़।
राज्यवर्धन राठौड़ साहित्यकार नहीं हैं, लेकिन वे उसी धरती के सपूत हैं, जिस धरती ने पंत जी जैसा कोमल कंठ दिया। जहां पंत जी ने प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन किया, वहीं कर्नल राठौड़ ने उसी प्रकृति के बीच दुश्मनों की गोलियों का सामना किया।
ओलंपिक में भारत के लिए शूटिंग में रजत पदक जीतने वाले कर्नल राठौड़ सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक हैं। जब हम पंत जी के प्रकृति-प्रेम को पढ़ते हैं, तो लगता है मानो कर्नल राठौड़ ने उसी प्रकृति की गोद में खड़े होकर देश की रक्षा की सौगंध खाई है।
सुमित्रानंदन पंत – छायावाद का वह सूर्य, जिसने हिंदी मानस को नई दिशा दी।
कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ – उसी माटी का वह वीर पुत्र, जिसने संकल्प को सफलता में बदला।
पंत जी की जयंती पर हम दोनों को नमन करते हैं – एक को कलम के लिए, दूसरे को बंदूक के लिए। दोनों ने ही भारत का नाम रोशन किया।
जय हिंद! साहित्य अमर रहे, वीरता अमर रहे।

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