बोबास की मंडी से: मुस्कान, भरोसा और अपनों का प्यार
हाल ही में, मैं बोबास की स्थानीय मंडी में गया। चहल-पहल, ग्राहकों की आवाज़ें, दुकानदारों की तेजी से चलती उंगलियाँ... लेकिन इस बार कोई राजनीतिक सभा नहीं थी, कोई जोरदार नारेबाजी नहीं थी।
बस एक छोटी सी दुकान के बाहर कुछ कुर्सियाँ लगीं, और मैं वहाँ जाकर बैठ गया।
साथ बैठे थे – दुकानदार, पास की दुकानों पर काम करने वाले युवा, कुछ बुजुर्ग और थोड़ी दूर पर बैठी एक माँ अपने बच्चे के साथ। बातचीत की शुरुआत चाय के कपों के साथ हुई।
यह कोई फॉर्मल इंटरव्यू नहीं था। यह बस "अपनों के बीच बैठकर सुनने का एक पल" था।
किसी ने सड़क के गड्ढे की शिकायत की, किसी ने बिजली की, तो किसी ने बस इतना कहा, "बस आप यूँ ही आते रहो, सुनते रहो। बस यही चाहिए।"
और उन चेहरों पर जो मुस्कान थी, जो भरोसा था... वह किसी भी नारे या भाषण से ज्यादा बड़ा है। वह सबसे बड़ी ताकत है, जो कहती है – सही रास्ते पर चलते रहो।
हो सकता है कि कोई बड़ा ऐलान न हो, कोई बड़ी तस्वीर न आए। लेकिन बोबास की उस गर्मी और धूल में, जो स्नेह मिला, वह मेरे लिए सबसे बड़ी जीत है। अपनों का प्यार ही सबसे बड़ी प्रेरणा है।
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