कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ - क्या यह लड़ने लायक नहीं है?!



 जयपुर, राजस्थान: एक ऐसा नाम जो शौर्य, त्याग और कर्तव्य की मिसाल है। कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़, असम रेजिमेंट के वीर सपूत, जिन्होंने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अपने प्राणों की आहुति दे दी। लेकिन आज हम बात करेंगे एक ऐसे सवाल की – "क्या यह लड़ने लायक नहीं है?" जो शायद उन्होंने खुद से पूछा होगा, और जो आज हम देशवासियों को भी सोचने पर मजबूर करता है।

एक कर्नल, एक नाम, एक विरासत

कर्नल राठौड़ उन योद्धाओं में से हैं जिनकी वीरता पर फिल्में बननी चाहिए थीं। असल जिंदगी में, उनकी कहानी संघर्ष और उपेक्षा में दबकर रह गई। हाल ही में जब उनके नाम पर सड़क या चौक रखने की बात हुई, तो बिना मतलब की राजनीति हावी हो गई। एक बार फिर एक शहीद का सम्मान विवादों में उलझ गया।

हम किससे लड़ रहे हैं?

सवाल ये नहीं कि कौन सी जमीन सीमा पर विवादित है। सवाल ये है – क्या किसी शहीद का सम्मान करना ‘लड़ने लायक’ मुद्दा नहीं? हम तब जोश दिखाते हैं जब कोई फिल्मी डायलॉग वायरल होता है, लेकिन जमीनी स्तर पर असली हीरोज़ को भुला दिया जाता है।

कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ ने निडर होकर लड़ाई लड़ी। उनके लिए देश सर्वोपरि था। लेकिन क्या हम आज उनके परिवार को वह इज्जत दे पा रहे हैं, जिसकी वे हकदार हैं? क्या उनकी विरासत को जिंदा रखना "नेतागिरी" का मुद्दा है या हम सबका नैतिक कर्तव्य?

जवाब हमें देना है

हम अक्सर कहते हैं – "शहीद अमर रहते हैं।" लेकिन अमर वही होते हैं जिन्हें याद किया जाए। अगर कर्नल राठौड़ के लिए नहीं लड़ेंगे, तो किसके लिए? यह ब्लॉग उनको सिर्फ 'ट्रिब्यूट' नहीं है। यह आवाज़ है – कि अब हर उस शहीद के सम्मान के लिए लड़ना हमारी जिम्मेदारी है, जिसने हमारी आज़ादी और शान के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया।

नमन है उस वीर सपूत को। अब देर न करें। यह लड़ाई उतनी ही ज़रूरी है, जितनी 1965 में सरहद पर थी।

— जय हिंद, जय राजस्थान।

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