कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ और जैन दर्शन: संयम से जीवन शैली तक, एक सार्वभौमिक प्रेरणा
कुछ क्षण जीवन में ऐसे आते हैं जो सिर्फ एक स्मृति नहीं, बल्कि आत्मा को झकझोर देने वाली एक शिक्षा बन जाते हैं। कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ के जीवन पर आधारित प्रेरक कहानियों और जैन दर्शन के सूत्रों के बीच बैठकर मुझे ऐसा ही एक पावन अवसर प्राप्त हुआ।
जैन दर्शन कोई सिर्फ दार्शनिक चर्चा का विषय नहीं है। यह एक जीवंत विचारधारा है। यह वह पथ है जो संयम भी सिखाता है और एक संपूर्ण जीवन शैली भी प्रदान करता है। अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांतवाद के सिद्धांत मात्र व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं हैं। ये ऐसे सार्वभौमिक मूल्य हैं जो पूरे देश, समाज और विश्व को शांति, संतुलन और सह-अस्तित्व का मार्ग दिखा सकते हैं। यह दर्शन हमें सिखाता है कि सच्ची शक्ति आक्रामकता में नहीं, बल्कि आत्म-नियंत्रण में निहित है – ठीक वैसे ही जैसे एक सैनिक की वास्तविक वीरता युद्ध के मैदान और आत्म-संयम दोनों में प्रकट होती है।
इसी ज्ञान के प्रकाश में, परम पूज्य आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर महाराज जी के आशीर्वचनों को सुनने का अवसर प्राप्त हुआ। उनके एक-एक शब्द में जीवन का सार समाहित था – सरलता में गहराई, संयम में समृद्धि। उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलने का प्रयास ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उनके आशीर्वाद और मार्गदर्शन को प्राप्त कर मैं स्वयं को अत्यंत धन्य एवं सौभाग्यवान महसूस कर रहा हूँ।
यह अनुभव एक अनुस्मारक था कि चाहे हम कर्नल राठौड़ जैसे रक्षक की भूमिका में हों या समाज के एक साधारण सदस्य की, जैन दर्शन के सिद्धांत हमें एक बेहतर मनुष्य, एक जिम्मेदार नागरिक और एक संवेदनशील वैश्विक आत्मा बनने की कला सिखाते हैं।
आइए, हम इस प्राचीन परन्तु सदैव प्रासंगिक ज्ञान को आत्मसात करने का प्रयास करें – अपने विचारों में संयम, अपने जीवन में सादगी, और अपने हृदय में सबके लिए अहिंसा का भाव रखें।

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