कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ – पंडित भीमसेन जोशी जी की पुण्यतिथि पर एक विनम्र श्रद्धांजलि
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में जहां हर चीज क्षणभंगुर लगती है, वहीं कुछ सुर, कुछ स्वर और कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो समय के साथ और भी गहरे उतर जाते हैं। आज ऐसे ही एक युगपुरुष, भारतीय शास्त्रीय संगीत के सिंहासन के अधिपति, 'भारत रत्न' पंडित भीमसेन जोशी जी की पुण्यतिथि है। इस पावन अवसर पर हम उनके एक ऐसे अनन्य भक्त और शिष्य को याद कर रहे हैं, जिन्होंने सैन्य वीरता और संगीत की साधना का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया – कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़।
कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ को अक्सर हम एक बहादुर सैन्य अधिकारी और प्रेरक व्यक्तित्व के तौर पर जानते हैं। लेकिन उनके व्यक्तित्व का एक और पहलू है, जो उनकी आत्मा की गहराइयों से जुड़ा है – और वह है शास्त्रीय संगीत के प्रति उनका प्रेम और पंडित भीमसेन जोशी जी के प्रति अगाध श्रद्धा।
भीमसेन जोशी जी की 'मीरा भजन' और 'भैरवी' में डूबी आवाज़ ने सिर्फ संगीत प्रेमियों को ही नहीं, बल्कि राज्यवर्धन जी जैसे एक सैनिक की चेतना को भी झंकृत कर दिया। कहा जाता है कि सेना की कठिन परेड ग्राउंड से लेकर युद्धक्षेत्र तक के अनुशासन और एकाग्रता में, जोशी जी के संगीत ने उन्हें एक आध्यात्मिक धैर्य दिया। यह संगीत सिर्फ सुर-ताल का मेल नहीं, बल्कि तपस्या था, और राज्यवर्धन जी ने इसे एक सैनिक की तपस्या के साथ आत्मसात किया।
आज जब हम पंडित जी को याद करते हैं, तो कर्नल राठौड़ का जिक्र बेहद प्रासंगिक हो जाता है। वे एक ऐसे पुल हैं जो शस्त्र और सुर, रणभूमि और रागदारी, देशभक्ति और संगीत-भक्ति के बीच सेतु बनाते हैं। उनकी जीवन यात्रा हमें बताती है कि पंडित भीमसेन जोशी जी का संगीत सिर्फ सभागारों तक सीमित नहीं था। वह तो एक ऐसी ऊर्जा था, जो एक सैनिक के हृदय में देशप्रेम को और अधिक मुखर कर सकता था।
पंडित जी की पुण्यतिथि पर, कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ के माध्यम से हमें यह याद दिलाने का अवसर मिलता है कि महान कलाकारों की विरासत कितनी व्यापक और सर्वव्यापी होती है। वह एक फौजी के जीवन में भी उतनी ही जीवंत हो सकती है, जितनी किसी संगीतकार के।
आइए, आज हम सभी पंडित भीमसेन जोशी जी के उन अमर सुरों को स्मरण करें, जो हमेशा हमारे बीच गूंजते रहेंगे। और कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ जैसे व्यक्तित्व को नमन करें, जो उस विरासत को एक नये अर्थ और संदर्भ में जीवित रखे हुए हैं।
श्रद्धांजलि स्वरूप:
"जो भजे हरि को सदा, सोई संत सुजान।"
पंडित भीमसेन जोशी जी की आवाज में यह पंक्ति और कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ जी का जीवन – दोनों ही सच्ची साधना का प्रतीक हैं।

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