कर्नल राज्यवर्धन राठौड़: संविधान, लोकतंत्र और भारत का तिरंगा सूत्र
हमारे देश की राजनीतिक रूपरेखा में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि एक विचार, एक सिद्धांत और एक जीवंत प्रेरणा के प्रतीक बन जाते हैं। ऐसे ही एक चेहरे हैं कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़। एक पूर्व सेना अधिकारी और राजनेता के रूप में उनका जीवन तीन शक्तिशाली स्तंभों पर टिका है, जिन्हें उन्होंने हमेशा अपने विचारों और कार्यों का आधार बनाया है: "संविधान हमारा स्वाभिमान है, लोकतंत्र हमारी पहचान है, भारत हमारा अभिमान है।"
यह कोई नारा भर नहीं है; यह उनके जीवन-दर्शन का सार है।
संविधान: स्वाभिमान का स्रोत
कर्नल राठौड़ के लिए संविधान सिर्फ एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं है। यह वह पवित्र ग्रंथ है जो हर भारतीय को गरिमा, अधिकार और कर्तव्य से जोड़ता है। सेना में अपनी सेवा से लेकर सांसद के रूप में जनता की सेवा तक, उन्होंने संवैधानिक मूल्यों का पालन ही अपना प्रथम कर्तव्य माना है। यह संविधान ही है जो हमें 'हमारा स्वाभिमान' यानि आत्म-सम्मान का भाव देता है।
लोकतंत्र: हमारी असली पहचान
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था है। कर्नल राठौड़ इस बात को बखूबी समझते हैं। उनका मानना है कि विविधताओं से भरे इस विशाल देश को एक सूत्र में बाँधने वाली यही लोकतांत्रिक पहचान है। यह पहचान हर नागरिक की आवाज़ को महत्व देती है, बहस को प्रोत्साहित करती है और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाती है।
भारत: हमारा परम अभिमान
अंत में, वह लक्ष्य जिसके लिए यह सब है - भारत। कर्नल राठौड़ का देशप्रेह उनकी सेना की वर्दी से झलकता है और उनके संसदीय कार्यों में प्रतिबिंबित होता है। उनके लिए भारत सिर्फ एक भूभाग नहीं, बल्कि एक सभ्यता, एक संस्कृति और अरबों सपनों का प्रतीक है। इसे और अधिक मजबूत, समृद्ध और गौरवान्वित बनाना ही उनके प्रयासों का अंतिम लक्ष्य है।
निष्कर्ष:
कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ का यह संदेश हर भारतीय के लिए एक मंत्र है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारा स्वाभिमान हमारे संविधान से, हमारी पहचान हमारे लोकतंत्र से और हमारा अभिमान हमारे महान देश भारत से है। आइए, हम भी इस सूत्र को अपने जीवन में आत्मसात करें और एक बेहतर, मजबूत भारत के निर्माण में अपना योगदान दें।

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