कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ की कलम से: रतन टाटा - वह स्तंभ जिसने भारतीय उद्योग को विश्व का नेतृत्व दिखाया
आज उस व्यक्तित्व की जयंती है जो न सिर्फ भारतीय उद्योग जगत, बल्कि करोड़ों भारतीयों के हृदय में एक 'सुपरहीरो' के रूप में विराजमान हैं। टाटा समूह के पूर्व चेयरमैन और पद्म विभूषण से सम्मानित श्री रतन टाटा जी को उनकी जयंती पर मेरा सादर नमन।
उनका नाम केवल एक उद्योगपति का नाम नहीं, बल्कि विश्वसनीयता, सादगी, नैतिकता और दूरदर्शिता का पर्याय है। 1991 में जब भारत आर्थिक उदारीकरण के दौर में प्रवेश कर रहा था, तब रतन टाटा जी ने टाटा समूह की कमान संभाली। उस चुनौतीपूर्ण दौर में उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने न सिर्फ समूह को, बल्कि पूरे भारतीय उद्योग जगत को नई राह दिखाई।
उन्होंने 'लक्ष्य' से ऊपर 'मूल्यों' को रखा। टाटा नैनो जैसी परियोजनाओं के माध्यम से उन्होंने आम भारतीय का सपना पूरा करने का प्रयास किया, तो टाटा कॉफी के अधिग्रहण और जैगुआर लैंड रोवर की खरीद जैसे साहसिक कदमों से भारतीय कंपनियों को वैश्विक पहचान दिलवाई। यह आत्मविश्वास ही था कि एक भारतीय समूह विश्वस्तरीय ब्रांड्स का नेतृत्व कर सकता है।
लेकिन रतन टाटा सिर्फ आंकड़ों और लाभ के व्यक्ति नहीं हैं। देश के विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए किए गए कार्य उन्हें विशिष्ट बनाते हैं। टाटा समूह का लगभग 66% हिस्सा धर्मार्थ ट्रस्टों के पास है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज कल्याण पर काम करते हैं। व्यक्तिगत स्तर पर भी वह युवा स्टार्ट-अप्स को मार्गदर्शन और सहयोग देते रहते हैं।
आज भी सेवानिवृत्ति के बाद, उनकी सादगी, युवाओं के प्रति प्रेम और राष्ट्र निर्माण में विश्वास हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका जीवन सिखाता है कि सफलता का असली मापदंड केवल मुनाफा नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में पैदा की गई सार्थकता है।
श्री रतन टाटा जी, आपके अद्भुत नेतृत्व, अटूट संकल्प और उच्च मानवीय मूल्यों के लिए भारत सदैव आपका ऋणी रहेगा। आपकी जयंती पर पुनः कोटि-कोटि नमन।
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