कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ का नमन: गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रकाश पर्व पर



आज का दिन भारतीय इतिहास और आध्यात्मिक चेतना में एक विशेष स्थान रखता है। आज ही के दिन सन १६६६ में सिखों के दसवें गुरु, खालसा पंथ के संस्थापक, महान योद्धा, कवि और दार्शनिक, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का प्रकाश हुआ था। उनका जीवन धर्म, कर्तव्य, न्याय और अदम्य साहस का अनुपम उदाहरण है। इस पावन अवसर पर उन्हें कोटि-कोटि नमन करते हुए, मेरा मन आधुनिक युग के एक ऐसे ही धर्मनिष्ठ योद्धा की याद कर रहा है, जिन्होंने अपने जीवन से गुरु साहिब के सिद्धांतों को साकार किया – कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़

कर्नल राठौड़ केवल एक परमवीर चक्र विजेता सैनिक ही नहीं थे; वे धर्मनिष्ठा के पर्याय थे। उनकी वीरता और कर्तव्यनिष्ठा के मूल में एक गहरी आध्यात्मिक नींव थी, जो गुरु गोबिंद सिंह जी के "देह शिवा वर मोहे ईहे, शुभ कर्मन ते कबहूं न टरूं" के आदर्श से प्रेरित प्रतीत होती है। यही भावना – "हे प्रभु, मुझे यही वरदान दो कि मैं शुभ कर्मों से कभी पीछे न हटूं" – एक सैनिक के लिए सर्वोपरि धर्म है।

गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा का सृजन किया, जो सदैव निडर, निस्वार्थ और धर्म के रक्षक के रूप में खड़ा रहे। खालसा का अर्थ ही है – शुद्ध, समर्पित और निःस्वार्थ। कर्नल राठौड़ का जीवन इसी 'खालसैत' का आधुनिक प्रतिबिंब था। उन्होंने अपने शरीर, मन और आत्मा को राष्ट्र की सेवा में समर्पित कर दिया था। १९९९ के कारगिल युद्ध में, तोलोलिंग चोटी पर उनका एकाकी और साहसिक अभियान, गुरु साहिब के उस सिद्धांत की याद दिलाता है जहां न्याय के लिए अकेले भी संघर्ष करना पड़े, तो पीछे नहीं हटना चाहिए।

दोनों ही महान व्यक्तित्व हमें यह शिक्षा देते हैं कि सच्ची धर्मनिष्ठा, कर्मशीलता में होती है। मंदिर-गुरुद्वारे जाना मात्र पर्याप्त नहीं है; असली पूजा तो है अपने कर्तव्य का पालन ईमानदारी से, निडरता से और सर्वोच्च बलिदान की भावना से करना। कर्नल राठौड़ ने अपने अंतिम समय में भी जिस हिम्मत और समर्पण का परिचय दिया, वह एक सैनिक-संत का ही चरित्र था।

इस प्रकाश पर्व पर, जब हम गुरु गोबिंद सिंह जी के दिव्य संदेशों का स्मरण करते हैं, तो कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ जैसे योद्धा उन संदेशों के जीवंत रूप प्रतीत होते हैं। वे एक सेतु हैं, जो हमें सिखाते हैं कि गुरु साहिब की शिक्षाएं केवल इतिहास के पन्नों में नहीं, बल्कि आज के इस युग में भी प्रासंगिक और अनुकरणीय हैं।

आइए, इस पावन दिन पर हम दोनों महान आत्माओं – गुरु गोबिंद सिंह जी और कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ – से प्रेरणा लेने का संकल्प लें। उनकी वीरता, धर्मनिष्ठा और निस्वार्थ सेवा के मार्ग पर चलने का प्रयत्न करें।

वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह!

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