सहकारिता के मसीहा: वैकुंठभाई मेहता की जयंती पर विशेष

 

आज हम सभी एक ऐसे महान व्यक्तित्व को याद कर रहे हैं, जिन्होंने भारत की आर्थिक और सामाजिक भूमि पर सहकारिता की अमिट छाप छोड़ी है। सहकारिता आंदोलन के प्रेरणास्रोत, स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवी वैकुंठभाई मेहता जी की जयंती पर उन्हें हमारा सादर नमन।

कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ जी ने सही कहा है कि सहकारी बैंकिंग, कृषि समितियों और उपभोक्ता संस्थाओं की मजबूत नींव रखकर वैकुंठभाई मेहता जी ने सहयोग और स्वावलंबन की भावना को एक नई दिशा दी।

एक संक्षिप्त परिचय:
वैकुंठभाई मेहता सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक विचार और एक आंदोलन हैं। उनका मानना था कि आर्थिक सशक्तिकरण के बिना सामाजिक स्वतंत्रता अधूरी है। स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका निभाने के बाद, उन्होंने अपना पूरा जीवन इसी सिद्धांत को साकार करने में लगा दिया।

एक मजबूत नींव का निर्माण:
उनके प्रयासों ने भारत में सहकारी संस्थाओं को एक ठोस ढांचा प्रदान किया। आज देश के कोने-कोने में फैले सहकारी बैंक ग्रामीण और शहरी लोगों को सहज वित्तीय सेवाएं प्रदान कर रहे हैं, यह उनकी दूरदर्शिता का ही परिणाम है। कृषि समितियों के माध्यम से किसानों को बिचौलियों से मुक्ति मिली और उपभोक्ता संस्थाओं ने निष्पक्ष व्यापार को बढ़ावा दिया।

आज के संदर्भ में प्रासंगिकता:
आज जब हम 'आत्मनिर्भर भारत' की बात करते हैं, तो वैकुंठभाई मेहता का सहकारिता का मॉडल और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि वास्तविक सशक्तिकरण तब होता है जब समुदाय एकजुट होकर अपने आर्थिक विकास की बागडोर स्वयं संभालते हैं।

उनके विचार और आदर्श आज भी हमें समाज को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने की प्रेरणा देते हैं। इस महान सपूत को कोटि-कोटि नमन।

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